बाल विवाह मुक्त भारत मिशन: 2030 तक बाल विवाह समाप्त करने की राष्ट्रीय प्रतिज्ञा
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बाल विवाह मुक्त भारत अभियान 2030 तक बाल विवाह समाप्त करने के लिए कानून, तकनीक और सामुदायिक भागीदारी को जोड़ता है।
छत्तीसगढ़ के बालोद और सूरजपुर जिलों ने बाल विवाह उन्मूलन में देश के लिए आदर्श मॉडल प्रस्तुत किया है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों ने बाल विवाह रोकथाम को सख्त और बाल-केंद्रित बनाया है।
बाल विवाह: एक जटिल सामाजिक समस्या
कानूनी प्रतिबंधों और जागरूकता अभियानों के बावजूद भारत में बाल विवाह पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाया है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019–21) के अनुसार, 20–24 वर्ष की आयु की लगभग 23% महिलाओं का विवाह 18 वर्ष से पहले हो चुका था। यह आंकड़ा दर्शाता है कि बाल विवाह न केवल सामाजिक, बल्कि स्वास्थ्य और मानवाधिकार से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
बाल विवाह का प्रभाव विशेष रूप से लड़कियों पर पड़ता है। कम उम्र में गर्भधारण, शिक्षा से वंचित होना, घरेलू हिंसा का जोखिम और आर्थिक निर्भरता ये सभी इसके प्रत्यक्ष परिणाम हैं। गरीबी, अशिक्षा, सामाजिक परंपराएं और लैंगिक असमानता इस समस्या को और गहरा बनाती हैं।
बाल विवाह की कानूनी परिभाषा
बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के अनुसार, यदि लड़की की उम्र 18 वर्ष से कम और लड़के की उम्र 21 वर्ष से कम है, तो ऐसा विवाह बाल विवाह की श्रेणी में आता है। यह अधिनियम बाल विवाह को न केवल अवैध घोषित करता है, बल्कि उसे रद्द करने, रोकने और दोषियों को दंडित करने का प्रावधान भी करता है।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 और पॉक्सो अधिनियम, 2012 के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध बलात्कार की श्रेणी में आता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसे गंभीर यौन अपराध माना है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सुधार से कानून तक
भारत में बाल विवाह के खिलाफ संघर्ष 19वीं सदी से शुरू हुआ। राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और ज्योतिराव फुले जैसे समाज सुधारकों ने इस प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई।
1891: सहमति की आयु अधिनियम
1929: शारदा अधिनियम
1978: विवाह की न्यूनतम आयु में वृद्धि
2006: बाल विवाह निषेध अधिनियम लागू
इन प्रयासों ने बाल विवाह की दर में गिरावट तो लाई, लेकिन पूर्ण उन्मूलन अब भी एक चुनौती बना रहा।
बाल विवाह मुक्त भारत (BVMB): एक राष्ट्रीय संकल्प
27 नवंबर 2024 को शुरू हुआ बाल विवाह मुक्त भारत (BVMB) अभियान, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की एक महत्वाकांक्षी पहल है। इसका लक्ष्य है-
2026 तक बाल विवाह की दर को 10% तक कम करना
2030 तक भारत को पूरी तरह बाल विवाह मुक्त बनाना
यह मिशन सतत विकास लक्ष्य (SDG) 5.3 के अनुरूप है और संवैधानिक अनुच्छेद 21 के तहत बच्चों के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को मजबूत करता है।
सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय
18 अक्टूबर 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने बाल विवाह रोकने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए। अदालत ने-
पूर्णकालिक बाल विवाह निषेध अधिकारियों (CMPO) की नियुक्ति
जिला स्तर पर विशेष इकाइयों की स्थापना
स्कूलों, NGOs और धार्मिक नेताओं की भागीदारी
तकनीक-आधारित रिपोर्टिंग सिस्टम
जैसे कदम अनिवार्य किए।
100 दिवसीय विशेष अभियान
4 दिसंबर 2025 से देशभर में 100 दिवसीय विशेष अभियान शुरू किया गया, जिसमें हर महीने अलग-अलग जागरूकता विषय रखा गया। इसके तहत दो प्रमुख पहल शुरू की गईं-
बाल विवाह मुक्त ग्राम प्रमाण पत्र
बाल विवाह मुक्त भारत योद्धा पुरस्कार
इनका उद्देश्य सकारात्मक प्रतिस्पर्धा और सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देना है।
डिजिटल पहल: BVMB पोर्टल
बाल विवाह मुक्त भारत पोर्टल एक केंद्रीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जहां-
बाल विवाह की रियल-टाइम रिपोर्टिंग
CMPO की जानकारी
जिला व पंचायत स्तर की प्रगति
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है।
छत्तीसगढ़: बदलाव की मिसाल
छत्तीसगढ़ के बालोद जिले ने 2025 में भारत का पहला बाल विवाह मुक्त जिला बनकर इतिहास रच दिया। यहां लगातार दो वर्षों तक एक भी बाल विवाह का मामला दर्ज नहीं हुआ।
इसके अलावा, सूरजपुर जिले की 75 ग्राम पंचायतों को 17 सितंबर 2025 को “बाल विवाह मुक्त पंचायत” घोषित किया गया।
अंतरराष्ट्रीय समर्थन
यूनिसेफ और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने BVMB को तकनीकी और रणनीतिक सहयोग दिया है। इससे भारत दक्षिण एशिया में बाल विवाह उन्मूलन के क्षेत्र में एक अग्रणी देश के रूप में उभर रहा है।
बाल विवाह मुक्त भारत अभियान केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक सामूहिक आंदोलन है। कानून, तकनीक, जागरूकता और समुदाय की भागीदारी इन सभी के समन्वय से भारत 2030 तक बाल विवाह मुक्त राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है। यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और समान अवसरों की मजबूत नींव रखती है।